Symptoms of Postpartum Depression: डिलीवरी के बाद सिर्फ शरीर ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है असर
देश दुनिया के ब्रेकिंग न्यूज और बाकी सभी अपडेट के लिए www.TheBoltaBharat.com का Whatsapp चैनल नीचे को दिये गये लिंक को टैप/क्लिक करके जुड़ सकते हैं-Follow On Whatsapp
आशीष दुबे
बच्चे का जन्म किसी भी परिवार के लिए खुशियों का अवसर होता है। लेकिन इसी दौरान नई मां के शरीर और मानसिक स्थिति में कई बड़े बदलाव भी आते हैं। गर्भावस्था और प्रसव के बाद हार्मोन में तेजी से होने वाले बदलाव, लगातार नींद की कमी, शारीरिक थकान और नवजात की देखभाल की जिम्मेदारी कई महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
अधिकांश महिलाओं को डिलीवरी के बाद कुछ दिनों तक हल्की उदासी, मूड स्विंग या भावुकता महसूस होती है, जिसे सामान्य तौर पर “बेबी ब्लूज” कहा जाता है। यह स्थिति आमतौर पर कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाती है। लेकिन अगर उदासी, चिंता, निराशा या घबराहट लगातार बनी रहे और महिला की सामान्य दिनचर्या प्रभावित होने लगे, तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum Depression) का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी होता है।
पोस्टपार्टम डिप्रेशन क्या होता है?
पोस्टपार्टम डिप्रेशन (PPD) एक मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, जो बच्चे के जन्म के बाद कुछ महिलाओं में विकसित हो सकती है। यह सामान्य बेबी ब्लूज से अलग और अधिक गंभीर स्थिति होती है। इसके लक्षण कई सप्ताह या महीनों तक बने रह सकते हैं और बिना इलाज के यह स्थिति गंभीर रूप ले सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पोस्टपार्टम डिप्रेशन का समय पर इलाज न होने पर इसका असर मां के साथ-साथ बच्चे की देखभाल, परिवार और पूरे घरेलू वातावरण पर भी पड़ सकता है।
पोस्टपार्टम डिप्रेशन के गंभीर लक्षण
1. लगातार उदासी या निराशा महसूस होना
अगर नई मां लंबे समय तक उदास रहती है, बिना किसी स्पष्ट कारण के रोने लगती है या पहले जिन कामों में खुशी मिलती थी उनमें भी रुचि खत्म हो जाती है, तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन का शुरुआती संकेत हो सकता है।
2. जरूरत से ज्यादा चिंता और घबराहट
बच्चे की सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर चिंता होना सामान्य बात है। लेकिन अगर महिला हर समय बेचैनी, घबराहट या डर महसूस करे और यह भावना लगातार बनी रहे, तो इसे सामान्य नहीं माना जाता।
3. नींद और भूख में बदलाव
कुछ महिलाओं को बहुत ज्यादा नींद आने लगती है, जबकि कुछ को बिल्कुल नींद नहीं आती। इसी तरह भूख कम लगना या जरूरत से ज्यादा खाना भी पोस्टपार्टम डिप्रेशन का लक्षण हो सकता है।
4. बच्चे से भावनात्मक जुड़ाव में कठिनाई
कुछ मामलों में नई मां को अपने नवजात से जुड़ाव महसूस करने में परेशानी होती है। वह बच्चे की देखभाल में रुचि कम दिखा सकती है या खुद को एक अच्छी मां न होने का दोष देने लगती है।
5. थकान और ऊर्जा की कमी
डिलीवरी के बाद सामान्य थकान स्वाभाविक है, लेकिन अगर महिला हर समय बेहद थकी हुई महसूस करे, किसी काम में मन न लगे और ऊर्जा की कमी लगातार बनी रहे, तो यह भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा संकेत हो सकता है।
6. ध्यान केंद्रित करने में परेशानी
पोस्टपार्टम डिप्रेशन से जूझ रही महिला को छोटी-छोटी बातें याद रखने, निर्णय लेने या किसी काम पर ध्यान लगाने में कठिनाई हो सकती है।
7. खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या जैसे विचार
यदि महिला के मन में खुद को नुकसान पहुंचाने, जीवन समाप्त करने या बच्चे को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार आने लगें, तो यह मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर आपात स्थिति मानी जाती है। ऐसे मामलों में तुरंत डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।किन महिलाओं में पोस्टपार्टम डिप्रेशन का खतरा अधिक होता है?
किन महिलाओं में पोस्टपार्टम डिप्रेशन का खतरा अधिक होता है?
कुछ परिस्थितियों में पोस्टपार्टम डिप्रेशन होने की संभावना बढ़ सकती है।
* पहले से डिप्रेशन या एंग्जायटी का इतिहास होना।
* परिवार या जीवनसाथी से पर्याप्त भावनात्मक सहयोग न मिलना।
* आर्थिक या पारिवारिक तनाव का सामना करना।
* समय से पहले या जटिल प्रसव होना।
* जुड़वां या एक से अधिक बच्चों का जन्म होना।
* लंबे समय तक नींद की कमी और अत्यधिक शारीरिक थकान।
पोस्टपार्टम डिप्रेशन से बचाव के उपाय
हालांकि हर मामले को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुछ सावधानियां जोखिम को कम करने में मदद कर सकती हैं।
पर्याप्त आराम और नींद लें
नई मां को पर्याप्त आराम मिलना जरूरी है। परिवार के सदस्य बच्चे की देखभाल में सहयोग करें ताकि मां को भी नींद पूरी करने का समय मिल सके।
संतुलित और पौष्टिक आहार लें
प्रसव के बाद शरीर को तेजी से रिकवरी की जरूरत होती है। इसलिए संतुलित भोजन, पर्याप्त पानी और पौष्टिक आहार मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए जरूरी है।
भावनात्मक सहयोग सबसे जरूरी
नई मां को अकेला महसूस नहीं होने देना चाहिए। परिवार और जीवनसाथी का सहयोग मानसिक तनाव कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अपनी भावनाएं खुलकर साझा करें
अगर महिला उदासी, घबराहट या तनाव महसूस कर रही है, तो उसे अपनी बात परिवार, करीबी लोगों या डॉक्टर से खुलकर बतानी चाहिए। समस्या छिपाने से स्थिति और गंभीर हो सकती है।
जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लें
यदि लक्षण दो सप्ताह से अधिक समय तक बने रहें या लगातार बढ़ते जाएं, तो मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक या स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना चाहिए। समय पर इलाज से अधिकांश महिलाएं पूरी तरह स्वस्थ हो सकती हैं।
कब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
अगर नई मां लगातार रो रही हो, सामान्य काम करने में असमर्थ हो, बच्चे की देखभाल नहीं कर पा रही हो या उसके मन में खुद को या बच्चे को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार आ रहे हों, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में तुरंत अस्पताल या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करना आवश्यक है।
Contact Us |
|
|
|
|
|
X/Twiter |
|
|
|
|
|
|

