आंखों की रोशनी चली गई तो मदद करेगा आर्टिफिशियल कॉर्निया? दिल्ली AIIMS में शुरू हुआ नया इलाज, जानिए कैसे काम करता है
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आशीष दुबे
नई दिल्ली। कॉर्निया की बीमारी के कारण आंखों की रोशनी खोने वाले मरीजों के लिए कॉर्निया ट्रांसप्लांट लंबे समय से उपचार का प्रमुख विकल्प रहा है। हालांकि, डोनर कॉर्निया की कमी के कारण बड़ी संख्या में मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता। इसी समस्या को देखते हुए दिल्ली स्थित एम्स के आरपी सेंटर में आर्टिफिशियल कॉर्निया पर भी काम किया जा रहा है। शुरुआती स्तर पर कुछ मरीजों में इसके इस्तेमाल की शुरुआत हो चुकी है।
कॉर्निया आंख के सामने मौजूद पारदर्शी परत होती है, जो रोशनी को आंख के अंदर पहुंचाने और साफ दिखाई देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब यह परत किसी बीमारी, चोट या अन्य कारण से गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो व्यक्ति की दृष्टि प्रभावित हो सकती है।
कॉर्निया खराब होने पर क्यों चली जाती है रोशनी?
कई लोगों में कॉर्निया की खराबी के कारण चीजें साफ दिखाई देना बंद हो जाती हैं। मेडिकल भाषा में ऐसी स्थिति को कॉर्नियल ब्लाइंडनेस कहा जाता है। गंभीर मामलों में कॉर्निया ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है।
कॉर्निया ट्रांसप्लांट में खराब कॉर्निया की जगह डोनर से प्राप्त स्वस्थ कॉर्निया लगाया जाता है। इससे कई मरीजों की दृष्टि में सुधार संभव होता है। लेकिन इस उपचार की सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त संख्या में डोनर कॉर्निया उपलब्ध होना है।
भारत में कॉर्निया की जरूरत के मुकाबले उपलब्ध डोनेशन कम होने के कारण सभी जरूरतमंद मरीजों को समय पर ट्रांसप्लांट नहीं मिल पाता। ऐसे में वैकल्पिक उपचार की तलाश महत्वपूर्ण हो जाती है।
दिल्ली AIIMS में आर्टिफिशियल कॉर्निया पर काम
नई दिल्ली के एम्स स्थित आरपी सेंटर में कॉर्निया ट्रांसप्लांट के साथ आर्टिफिशियल कॉर्निया पर भी काम किया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले करीब एक साल में कुछ मरीजों में आर्टिफिशियल कॉर्निया लगाने की शुरुआत की गई है।
एम्स के प्रोफेसर डॉ. राजेश सिन्हा के अनुसार, फिलहाल इस तकनीक का इस्तेमाल सीमित संख्या में मरीजों में किया जा रहा है। इसका उद्देश्य उन परिस्थितियों में एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध कराना है, जहां पारंपरिक कॉर्निया ट्रांसप्लांट चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
आर्टिफिशियल कॉर्निया को ऐसी तकनीक के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में डोनर कॉर्निया पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती है। हालांकि, इसके व्यापक इस्तेमाल से पहले इसकी प्रभावशीलता, सुरक्षा और लंबे समय के परिणामों का मूल्यांकन जरूरी है।
आर्टिफिशियल कॉर्निया क्या होता है?
आर्टिफिशियल कॉर्निया यानी कृत्रिम कॉर्निया एक मेडिकल उपकरण या संरचना होती है, जिसे क्षतिग्रस्त कॉर्निया की जगह दृष्टि सुधारने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका डिजाइन इस तरह किया जाता है कि आंख में प्रकाश के प्रवेश में मदद मिले।
सभी मरीजों के लिए आर्टिफिशियल कॉर्निया उपयुक्त हो, ऐसा नहीं है। मरीज की आंख की स्थिति, कॉर्निया की खराबी, पहले हुए उपचार और अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियों को देखकर डॉक्टर निर्णय लेते हैं।
इसी वजह से वर्तमान में इसे सामान्य कॉर्निया ट्रांसप्लांट का सीधा विकल्प मानना सही नहीं होगा। एम्स में भी इसका इस्तेमाल सीमित मरीजों में किया जा रहा है।
डोनर कॉर्निया की कमी बनी बड़ी चुनौती
भारत में कॉर्निया से जुड़ी दृष्टिहीनता के कई मरीज ऐसे हैं जिन्हें ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। लेकिन जरूरत के अनुपात में कॉर्निया डोनेशन कम होने से उपचार में इंतजार की स्थिति बन सकती है।
कॉर्निया डोनेशन में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आंखों से कॉर्निया निकालकर जरूरतमंद मरीज में प्रत्यारोपित किया जाता है। इसके लिए निर्धारित चिकित्सकीय और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है।
डोनर कॉर्निया की उपलब्धता बढ़ाना अब भी कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से निपटने की महत्वपूर्ण जरूरत है। इसके साथ ही कृत्रिम विकल्पों पर शोध और उपचार की संभावनाएं बढ़ने से भविष्य में मरीजों को अतिरिक्त विकल्प मिल सकते हैं।
किन मरीजों के लिए उपयोगी हो सकता है यह विकल्प?
आर्टिफिशियल कॉर्निया का इस्तेमाल हर तरह की आंखों की बीमारी में नहीं किया जाता। डॉक्टर मरीज की आंख की पूरी जांच के बाद यह तय करते हैं कि उसके लिए यह उपचार उपयुक्त है या नहीं।
जिन मरीजों में सामान्य कॉर्निया ट्रांसप्लांट संभव नहीं होता या उसके सफल होने की संभावना कम होती है, उनमें कुछ विशेष प्रकार के कृत्रिम कॉर्निया विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, इसका निर्णय केवल विशेषज्ञ नेत्र चिकित्सक ही कर सकते हैं।
अभी शुरुआती चरण में है तकनीक
दिल्ली एम्स में आर्टिफिशियल कॉर्निया का इस्तेमाल शुरू होना चिकित्सा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विकास है, लेकिन इसे लेकर बहुत बड़े दावे करना अभी जल्दबाजी होगी। फिलहाल इसका इस्तेमाल सीमित मरीजों में किया जा रहा है और आने वाले समय में अधिक अनुभव तथा चिकित्सकीय आंकड़ों से इसकी उपयोगिता को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।
यदि भविष्य में अलग-अलग प्रकार की कॉर्निया क्षति के लिए प्रभावी कृत्रिम विकल्प विकसित होते हैं, तो डोनर कॉर्निया की कमी से जूझ रहे मरीजों के लिए उपचार के विकल्प बढ़ सकते हैं।
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