बलिया के निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर सवाल, मौत के बाद समझौते के आरोप तेज
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आशीष दुबे, बलिया
बलिया। जिले के एक निजी अस्पताल में रविवार रात ऑपरेशन के बाद प्रसूता की तबीयत बिगड़ने से मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि महिला की हालत खराब होने पर अस्पताल प्रशासन ने उसे मऊ रेफर कर दिया, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। नवजात शिशु सुरक्षित बताया गया है। घटना के बाद एक बार फिर जिले के निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर सवाल उठने लगे हैं।
रामपुर गांव की रहने वाली थी मृतका
जानकारी के अनुसार, दोकटी थाना क्षेत्र के रामपुर गांव निवासी सत्येंद्र सिंह की पत्नी नेहा सिंह (26) को प्रसव पीड़ा होने पर शहर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। नेहा की शादी लगभग तीन वर्ष पहले बहुआरा गांव निवासी भोला सिंह की पुत्री के रूप में हुई थी। परिवार के अनुसार वह पहली बार मां बनने वाली थीं।
ऑपरेशन से पुत्री का जन्म, फिर बिगड़ी तबीयत
सोमवार रात चिकित्सकों ने ऑपरेशन के माध्यम से प्रसव कराया, जिसमें नेहा ने एक पुत्री को जन्म दिया। शुरुआती जानकारी के अनुसार जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ थे। कुछ समय बाद नेहा की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। अस्पताल के डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए मऊ रेफर कर दिया।
परिजन महिला को एम्बुलेंस से मऊ ले जा रहे थे, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। नवजात शिशु सुरक्षित है।
नौ दिन पहले भी सामने आया था ऐसा ही मामला
इस घटना से पहले 26 जुलाई को जिले के एक अन्य निजी अस्पताल में भी ऑपरेशन के बाद एक प्रसूता की मौत हुई थी। उस मामले में भी परिजनों ने इलाज में लापरवाही के आरोप लगाए थे। चर्चा यह भी रही कि बाद में अस्पताल प्रबंधन और पीड़ित पक्ष के बीच समझौता हो गया। लगातार कम समय में दूसरी घटना सामने आने से लोगों की चिंता बढ़ी है।
मौत के बाद समझौते के आरोप
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई मामलों में मरीज की मौत के बाद अस्पताल प्रबंधन और परिजनों के बीच आर्थिक समझौता कर मामले को शांत कराने की कोशिश की जाती है। यदि ऐसा होता है तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच प्रभावित हो सकती है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर उठे सवाल
लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद निजी अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि कार्रवाई अक्सर किसी घटना के बाद शुरू होती है, जबकि नियमित निरीक्षण और प्रभावी निगरानी से ऐसी घटनाओं की आशंका कम की जा सकती है।
जानकारी के अनुसार, पिछले सात महीनों में स्वास्थ्य विभाग ने 11 से अधिक निजी अस्पतालों और तीन अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर कार्रवाई करते हुए उन्हें सील किया था। इसके बावजूद इलाज के दौरान मरीजों की मौत के मामले सामने आते रहने से विभागीय निगरानी की प्रभावशीलता पर चर्चा तेज हो गई है।
वर्ष 2025 से अब तक कई मौतों की चर्चा
स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि वर्ष 2025 से अब तक जिले में जच्चा-बच्चा से जुड़े 16 से अधिक मौत के मामले सामने आ चुके हैं। इन घटनाओं ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर लोगों की चिंता बढ़ाई है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग उठ रही है।
CMO ने क्या कहा
मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. अभय राय ने कहा कि यह मामला उनके संज्ञान में नहीं है। यदि इस संबंध में शिकायत प्राप्त होती है या मामला संज्ञान में आता है तो नियमानुसार जांच कराई जाएगी और जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
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