होर्मुज खुलने के बाद भी नहीं मिलेगी राहत, चार महीनों के तेल संकट ने खाली कर दिए वैश्विक भंडार
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आशीष दुबे
पश्चिम एशिया में करीब चार महीने तक चले तनाव के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) के दोबारा खुलने की उम्मीद जरूर बढ़ी है, लेकिन वैश्विक तेल बाजार के सामने चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि इस लंबे संकट के दौरान कच्चे तेल की आपूर्ति पर इतना बड़ा असर पड़ा है कि केवल जलमार्ग खुल जाने से हालात सामान्य नहीं होंगे। पिछले चार महीनों में वैश्विक स्तर पर लगभग 1.15 अरब बैरल तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसका असर आने वाले महीनों तक दिखाई देगा।
चार महीने के संकट ने तेल बाजार को झकझोर दिया
28 फरवरी से शुरू हुए पश्चिम एशिया संकट के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित रही। अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बाद अब इस अहम समुद्री मार्ग के फिर से सामान्य होने की संभावना है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे तुरंत राहत मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
इन चार महीनों के दौरान दुनिया के कई देशों ने अपनी जरूरत पूरी करने के लिए रणनीतिक तेल भंडार का तेजी से इस्तेमाल किया। परिणामस्वरूप अब वैश्विक तेल भंडार कई दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुके हैं।
ऐतिहासिक रूप से घटे वैश्विक तेल भंडार
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों के ताजा आंकड़ों के अनुसार, विकसित देशों के समूह (OECD) का तेल भंडार 1990 के बाद सबसे कम स्तर पर पहुंच गया है। संकट शुरू होने के बाद से अब तक करीब 163 मिलियन बैरल तेल आपातकालीन भंडार से निकाला जा चुका है।
वहीं अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार, अमेरिका का रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व घटकर 340.3 मिलियन बैरल रह गया है, जो वर्ष 1983 के बाद का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2026 के अंत तक OECD देशों के पास केवल लगभग 50 दिनों की मांग पूरी करने लायक तेल भंडार बच सकता है।
होर्मुज खुलने के बाद भी सामान्य नहीं होगी आपूर्ति
ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि जलडमरूमध्य खुलने के बावजूद तेल की आपूर्ति पहले जैसी होने में समय लगेगा। इसके पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं।
समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाने में लगेगा समय
युद्ध के दौरान समुद्री मार्गों में बिछाई गई बारूदी सुरंगों को पूरी तरह हटाना आसान नहीं होगा। सुरक्षित नौवहन बहाल करने में कई सप्ताह लग सकते हैं।
टैंकर और बीमा सेवाओं की चुनौती
संकट के दौरान बड़ी संख्या में तेल टैंकरों ने अपने रूट बदल दिए थे। अब उन्हें दोबारा फारस की खाड़ी में लौटाना और उनके लिए बीमा सेवाएं बहाल करना भी समय लेने वाली प्रक्रिया होगी।
तेल प्रतिष्ठानों को हुआ भारी नुकसान
ईरान, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात के कई तेल उत्पादन केंद्रों और रिफाइनरियों को संघर्ष के दौरान नुकसान पहुंचा है। इन संयंत्रों को पूरी क्षमता के साथ दोबारा चालू होने में कई महीने लग सकते हैं।
ऊंची कीमतों का मांग पर भी पड़ेगा असर
ऊर्जा बाजार के जानकारों का अनुमान है कि तेल की ऊंची कीमतों का असर वैश्विक मांग पर भी दिखाई देगा।
अनुमान के अनुसार वर्ष 2026 में वैश्विक तेल मांग वर्ष 2025 की तुलना में लगभग 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन कम रह सकती है। हालांकि यदि व्यापारिक गतिविधियां सामान्य होती हैं तो वर्ष 2027 में मांग दोबारा 2 से 2.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
आगे क्या रह सकता है कच्चे तेल का रुख?
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) का मानना है कि जब तक वैश्विक तेल भंडार दोबारा नहीं भर जाते, तब तक बाजार में अस्थिरता बनी रहेगी। जैसे-जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही सामान्य होगी और मध्य पूर्व के तेल उत्पादन में सुधार आएगा, वैसे-वैसे कीमतों पर दबाव कम होने लगेगा।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2026 की चौथी तिमाही से कच्चे तेल की कीमतों में धीरे-धीरे नरमी आ सकती है। वहीं वर्ष 2027 की पहली तिमाही तक अधिकांश बंद उत्पादन पूरी तरह बहाल होने की संभावना है। यदि ऐसा होता है तो ब्रेंट क्रूड का औसत भाव 70 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ सकता है।
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