मोबाइल स्क्रीन पर बढ़ता समय बना चिंता का विषय
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आशीष दुबे, बलिया
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन लोगों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुका है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर छोटी-छोटी वीडियो यानी रील्स देखने का चलन तेजी से बढ़ा है। बच्चे हों, युवा हों या बुजुर्ग, हर वर्ग के लोग दिन का बड़ा हिस्सा मोबाइल स्क्रीन पर बिताने लगे हैं। हालांकि यह मनोरंजन का आसान माध्यम है, लेकिन लगातार स्क्रीन पर नजर टिकाए रखना आंखों की सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक मोबाइल या टैबलेट का उपयोग करने से आंखों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसके कारण आंखों में थकान, सूखापन, जलन और धुंधलापन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। यही वजह है कि डॉक्टर अब डिजिटल उपकरणों के संतुलित उपयोग की सलाह दे रहे हैं।
रील्स देखने से आंखों पर क्या असर पड़ता है?
सोशल मीडिया रील्स की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे लोगों को लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखती हैं। एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा वीडियो शुरू हो जाता है, जिससे उपयोगकर्ता बिना समय का एहसास किए घंटों मोबाइल चलाता रहता है।
लगातार स्क्रीन देखने से आंखों की मांसपेशियों पर दबाव बढ़ जाता है। इससे आंखें जल्दी थकने लगती हैं और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी हो सकती है। इसके अलावा मोबाइल इस्तेमाल करते समय लोग सामान्य से कम पलक झपकाते हैं, जिससे आंखों में नमी कम हो जाती है और ड्राई आई सिंड्रोम की समस्या पैदा हो सकती है।
कई लोगों को लंबे समय तक मोबाइल देखने के बाद धुंधला दिखाई देने लगता है। यह स्थिति आमतौर पर अस्थायी होती है, लेकिन लगातार ऐसा होना आंखों पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है।
ब्लू लाइट भी बन सकती है परेशानी
मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट की स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट को लेकर भी विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते रहे हैं। यह रोशनी शरीर के प्राकृतिक स्लीप साइकिल को प्रभावित कर सकती है।
रात में सोने से पहले लंबे समय तक रील्स देखने से मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। यह हार्मोन नींद को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके कारण नींद देर से आना, बार-बार नींद टूटना और सुबह थकान महसूस होना जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
आंखों की सुरक्षा के लिए अपनाएं 20-20-20 नियम
हर 20 मिनट बाद आंखों को दें आराम
आंखों की देखभाल के लिए विशेषज्ञ 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं। इसके तहत हर 20 मिनट बाद कम से कम 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर स्थित किसी वस्तु को देखना चाहिए। इससे आंखों की मांसपेशियों को आराम मिलता है और तनाव कम होता है।
स्क्रीन टाइम को करें नियंत्रित
बिना जरूरत घंटों मोबाइल देखने से बचें
यदि आप केवल मनोरंजन के लिए रील्स देखते हैं, तो उसके लिए एक निश्चित समय तय करें। लगातार कई घंटे मोबाइल देखने के बजाय बीच-बीच में ब्रेक लेना बेहतर होता है। इससे आंखों के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी जरूरी
शरीर में पानी की कमी का असर आंखों पर भी पड़ता है। पर्याप्त पानी न पीने से आंखों में सूखापन बढ़ सकता है। इसलिए दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जरूरी है। इससे आंखों की नमी बनी रहती है और जलन की समस्या कम होती है।
सही रोशनी में करें मोबाइल का उपयोग
कई लोग अंधेरे कमरे में मोबाइल चलाने की आदत रखते हैं, जो आंखों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। वहीं बहुत तेज रोशनी में भी स्क्रीन देखने से आंखों को परेशानी हो सकती है। इसलिए मोबाइल का उपयोग हमेशा संतुलित और पर्याप्त रोशनी वाले स्थान पर करना चाहिए।
एक दिन में कितना स्क्रीन टाइम सही माना जाता है?
विशेषज्ञों के अनुसार स्क्रीन टाइम उम्र के अनुसार सीमित होना चाहिए।
बच्चों के लिए
2 से 12 वर्ष तक के बच्चों का स्क्रीन टाइम प्रतिदिन 1 से 2 घंटे तक सीमित रखना बेहतर माना जाता है।
किशोरों के लिए
13 से 18 वर्ष के किशोरों के लिए मनोरंजन संबंधी स्क्रीन टाइम 2 से 3 घंटे तक रखना उचित माना जाता है।
वयस्कों के लिए
18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को काम से अलग मनोरंजन के लिए 4 से 6 घंटे से अधिक लगातार स्क्रीन उपयोग से बचना चाहिए। यदि काम के कारण स्क्रीन का उपयोग अधिक करना पड़ता है तो नियमित अंतराल पर ब्रेक लेना जरूरी है।
कब डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए?
यदि आंखों में लगातार जलन, दर्द, धुंधलापन, सिरदर्द या रोशनी से परेशानी जैसी समस्याएं बनी रहती हैं तो नेत्र विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करने से समस्या बढ़ सकती है।
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