युवा कवि अभिषेक मिश्रा की कविता ने “एक राष्ट्र, एक चुनाव” पर छेड़ी नई बहस

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बलिया के युवा कवि अभिषेक मिश्रा ने अपनी नई कविता “एक राष्ट्र, एक चुनाव – नई दिशा, नया सफ़र” के माध्यम से देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक बहस को साहित्यिक स्वर दिया है।

यह कविता बार-बार होने वाले चुनावों से जनता और शासन-प्रशासन पर पड़ने वाले प्रभावों को सजीव चित्रण के साथ प्रस्तुत करती है और समाधान के रूप में एक साथ चुनाव कराने का सुझाव देती है।

कविता में कवि ने लिखा है कि बार-बार होने वाले चुनावों से विकास कार्य बाधित होते हैं, धन और समय की भारी बर्बादी होती है और जनता को हर बार चुनावी वादों का सामना करना पड़ता है।

अभिषेक मिश्रा का कहना है कि यदि लोकसभा, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ हों तो विकास की गति तेज़ होगी, सरकारें अपना पूरा कार्यकाल पूरा कर सकेंगी और जनता को बार-बार मतदान की थकान से मुक्ति मिलेगी।

हालाँकि कविता में उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि क्या सभी राज्यों को एक समय पर चुनाव के लिए सहमत कराना संभव होगा और क्या यह व्यवस्था राज्यों की स्वायत्तता पर प्रभाव डालेगी।

अभिषेक मिश्रा की यह रचना न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए भी विचारणीय है। यह कविता जनता को इस मुद्दे पर बहस और संवाद के लिए प्रेरित करती है।

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