डेढ़ घंटे शव वाहन के लिए भटकते रहे गरीब परिजन, ऑटो में ले जाना पड़ा बुजुर्ग का शव
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ए.के दूबे
बलिया जिला अस्पताल (District Hospital) से सामने आई यह तस्वीर किसी भी संवेदनशील समाज को झकझोर देने के लिए काफी है। अस्पताल में भर्ती एक बुजुर्ग की मौत के बाद परिजनों को जो पीड़ा झेलनी पड़ी, उसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के तमाम दावों की पोल खोल दी।
मौत के बाद शुरू हुआ असली संघर्ष
बुजुर्ग की मौत के बाद परिजन शव को घर ले जाने के लिए शव वाहन (एंबुलेंस) की तलाश में करीब डेढ़ घंटे तक अस्पताल परिसर में भटकते रहे, लेकिन उन्हें एक अदद शव वाहन तक नसीब नहीं हुई। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में कई लोगों से गुहार लगाई गई, लेकिन किसी ने स्पष्ट जानकारी नहीं दी।
परिजनों का कहना है कि वे गरीब थे, न सिफारिश थी और न ही पहुंच, इसलिए उन्हें टाल दिया गया।
₹1000 खर्च कर बुलाया ऑटो, फिर भी नहीं मिली इज्जत
थक-हारकर मृतक के परिजनों को अपनी जेब से ₹1000 खर्च कर रिजर्व ऑटो कराना पड़ा। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
ऑटो में शव रखने की कोई व्यवस्था नहीं थी। असहाय परिजन शव को संभालने में जूझते रहे, आसपास लोग तमाशबीन बने रहे और अस्पताल प्रशासन पूरी तरह बेपरवाह नजर आया।
अगर ₹1000 भी नहीं होते, तो क्या होता?

यह घटना कई सवाल खड़े करती है—
अगर इस परिवार के पास ₹1000 भी न होते, तो क्या शव कंधे पर उठाकर ले जाना पड़ता?
क्या यही है मुफ्त और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं का सच?
एंबुलेंस सेवा और सरकारी योजनाएं सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं क्या?
गरीब की जिंदगी ही नहीं, मौत भी असहाय
यह मामला सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि उस सिस्टम की नाकामी है, जो गरीब को इलाज के दौरान भी और मौत के बाद भी बेसहारा छोड़ देता है। जिला अस्पताल से आई यह तस्वीर न सिर्फ शर्मनाक है, बल्कि व्यवस्था पर बड़ा सवाल भी है।
नोडल अधिकारी का बयान
शव वाहन नोडल अधिकारी डॉ. विनेश कुमार ने फोन पर बताया कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी 24 घंटे चलती है और मरीज की मृत्यु होने पर फॉर्म भरने के बाद शव वाहन उपलब्ध कराया जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि मामले की जांच कराई जाएगी।
जानकारी के अनुसार, अस्पताल परिसर में उस समय दो शव वाहन मौजूद थे, लेकिन सही सूचना के अभाव में परिजन भटकते रहे।
यह भी सामने आया है कि अस्पताल में कुछ बाहरी लोग मरीजों और परिजनों को भ्रमित करते हैं, जिससे व्यवस्था और अधिक चरमरा जाती है।
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