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राजीव यादव
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटों—तेज प्रताप और तेजस्वी यादव—की राजनीति को झकझोर कर रख दिया है।
महुआ सीट से हार के बाद भी तेज प्रताप जिस अंदाज़ में सामने आए, उसने साफ दिखा दिया कि उनके लिए यह हार व्यक्तिगत कम, पारिवारिक राजनीति का बदला ज्यादा थी।
दूसरी ओर तेजस्वी यादव, भले ही राघोपुर से सीट बचाने में सफल रहे हों, लेकिन पूरे बिहार की राजनीति में उनका किला बुरी तरह ढह गया। RJD महज़ 25 सीटों पर सिमट गई—तेजस्वी के नेतृत्व का यह अब तक का सबसे बड़ा झटका है।
तेज प्रताप की हार के बाद आई प्रतिक्रिया ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी। उन्होंने न सिर्फ महागठबंधन की पराजय को स्वीकार किया, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की खुलकर तारीफ़ करते हुए अपने ही परिवार पर तीखा निशाना साध दिया।
उन्होंने कहा—“हमारी हार में भी जनता की जीत है। अब परिवारवाद की राजनीति नहीं चलेगी… यह जयचंदों की करारी हार है।”
तेज प्रताप के यह शब्द किसी और की नहीं, सीधे-सीधे तेजस्वी की राजनीति पर तीर की तरह चुभते दिखे।
असल में, दोनों भाइयों की सियासी खींचतान नई नहीं है। 2015 में जब लालू प्रसाद ने दोनों बेटों को एक साथ राजनीति में लॉन्च किया, तभी से यह ठंडी जंग शुरू हो गई थी।
बड़े होने के बावजूद तेजस्वी को डिप्टी सीएम की कुर्सी मिली और तेज प्रताप को केवल मंत्री पद—यहीं से सम्मान की लड़ाई ने जन्म लिया। खुद को “कृष्ण” बताने वाले तेज प्रताप को यह बात हमेशा सालती रही कि असली सत्ता और लालू का आशीर्वाद छोटे भाई तेजस्वी को क्यों मिला।
इसके बाद 2019 में ‘तेज सेना’ बनाने का ऐलान हो या ‘लालू–राबड़ी मोर्चा’ शुरू करना—तेज प्रताप ने कई बार अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की, लेकिन हर बार तेजस्वी उनके दांव पर भारी पड़ते गए।
जब भी तेज प्रताप ने किसी उम्मीदवार को आगे बढ़ाया, तेजस्वी ने चाल पलटकर बाजी अपने हाथ में ले ली। तारापुर उपचुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा, जहां तेजस्वी ने तेज प्रताप के समर्थित उम्मीदवार को ही RJD में शामिल करा लिया।
इस बार तेज प्रताप ने अपनी पार्टी ‘जन शक्ति जनता’ बनाकर चुनावी रण में उतरने की कोशिश की। 44 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन 43 की जमानत ज़ब्त हो गई। फिर भी उनकी चेहरे की चमक और तेजस्वी की हार पर तंज बता रहे थे कि इस चुनाव में उनके लिए मुद्दा सीट नहीं, छोटे भाई की ‘राजनीतिक ठोकर’ थी।
तेज प्रताप की यह प्रतिक्रिया साफ करती है कि लालू परिवार में राजनीतिक विरासत की जंग अब और तीखी होने वाली है। बिहार की राजनीति में अब यह मुकाबला सिर्फ महागठबंधन और NDA का नहीं, बल्कि ‘लालू वंश’ के भीतर की खामोश लेकिन कड़वी जंग का भी है—जहां एक की हार दूसरे की मुस्कान बन रही है।
बिहार का चुनाव भले खत्म हो गया हो, लेकिन यादव परिवार की राजनीति—अब शुरू हुई है।
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